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Jatoli Shiv Temple: इस शिव मंदिर के पत्थर से आती है डमरू की आवाज? सालों से बना हुआ है रहस्य

Jatoli Shiv Temple: सावन के पवित्र महीने में देशभर के शिव मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ रही है। इसी बीच हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में स्थित जटोली शिव मंदिर अपनी अनोखी मान्यताओं और वास्तुकला के कारण श्रद्धालुओं के बीच खास आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। मंदिर को लेकर स्थानीय लोगों में मान्यता […]

By deepak · August 8, 2026 · 1 min read

Jatoli Shiv Temple: सावन के पवित्र महीने में देशभर के शिव मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ रही है। इसी बीच हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में स्थित जटोली शिव मंदिर अपनी अनोखी मान्यताओं और वास्तुकला के कारण श्रद्धालुओं के बीच खास आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

मंदिर को लेकर स्थानीय लोगों में मान्यता है कि यहां कुछ पत्थरों को थपथपाने पर उनसे डमरू जैसी आवाज सुनाई देती है। यही रहस्यमयी बात इस मंदिर को दूसरे शिव धामों से अलग बनाती है। हालांकि इस तरह की ध्वनि के पीछे वैज्ञानिक कारण को लेकर अलग-अलग मत हो सकते हैं।

जटोली शिव मंदिर के निर्माण की कहानी भी बेहद खास है। बताया जाता है कि स्वामी कृष्णानंद परमहंस ने वर्ष 1950 में इस दुर्गम पहाड़ी पर शिव मंदिर बनाने का संकल्प लिया था।

करीब 39 वर्षों तक चले निर्माण कार्य के दौरान वर्ष 1983 में स्वामी कृष्णानंद का निधन हो गया। इसके बाद उनके शिष्यों ने उनके संकल्प को पूरा करने का जिम्मा उठाया और मंदिर का निर्माण पूरा कराया।

सोलन की ऊंची पहाड़ी पर बना यह मंदिर करीब 111 फीट ऊंचा बताया जाता है। मंदिर की वास्तुकला में दक्षिण भारतीय शैली की झलक दिखाई देती है। इसके शिखर पर लगा विशाल स्वर्ण कलश इसकी सुंदरता को और बढ़ाता है।

मंदिर के गर्भगृह में भगवान शिव का भव्य शिवलिंग स्थापित है। परिसर में स्वामी कृष्णानंद परमहंस की समाधि भी स्थित है।

स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, जिस स्थान पर मंदिर बना है, वहां भगवान शिव ने कुछ समय विश्राम किया था। इसी वजह से इस स्थान को शिव से जुड़ा पवित्र स्थल माना जाता है। कहा जाता है कि भगवान शिव की लंबी जटाओं के कारण मंदिर का नाम जटोली पड़ा।

मंदिर के पास एक प्राचीन शिवलिंग भी स्थापित है, जिसकी श्रद्धालु पूजा करते हैं।

जटोली मंदिर की एक और खासियत यहां मौजूद जल कुंड है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, पहाड़ी क्षेत्र में जल की समस्या को देखते हुए स्वामी कृष्णानंद ने भगवान शिव की तपस्या की थी, जिसके बाद यहां जल कुंड की उत्पत्ति हुई।

श्रद्धालु इसके पानी को पवित्र मानते हैं और इसके औषधीय गुण होने की भी मान्यता है। हालांकि इन स्वास्थ्य संबंधी दावों की वैज्ञानिक पुष्टि अलग विषय है।

मंदिर का निर्माण पूरा होने के बाद इसे तुरंत आम श्रद्धालुओं के लिए नहीं खोला गया था। बाद में वर्ष 2013 में मंदिर को दर्शन के लिए खोला गया। आज यह हिमाचल प्रदेश के प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थलों में गिना जाता है।

Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है। News1 india इसकी पुष्टि नहीं करता है।

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Source: Read the original article on news1india.in